यहां कही गयी बातें मेरे व्यक्तिगत विचार हैं। गपशप की दुनिया में आपका स्वागत है।
यहां आइये,तो टिपियाइये, सिर्फ नकारात्मक शब्दों से बचें और सब मंजूर है। बहस को आगे बढ़ाये। सकारात्मक संवाद को बढ़ाने की दिशा में आपका सहयोग चाहिए। आप देंगे न!!

Tuesday, December 8, 2009

झारखंड के ग्रामीण मतदाताओं को प्रणाम

इस बार झारखंड के चुनाव में शहरी मतदाताओं के अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं ने भारी संख्या में शिरकत की। यहां शहरी या ग्रामीण होने से फर्क नहीं पड़ता। फर्क ये सोचकर पड़ता है कि हम जिन्हें काबिल, दुनियादारी के लिहाज से उत्तम और सूचनाओं के भंडार के बीच पाते हैं, वे ही सिर्फ एक वोट डालने की कवायद से खुद को दूर रखते हैं। ऐसा डिटैचमेंट या विमोह क्यों? क्यों ऐसा है कि शहरी लोग इस मामले में पीछे हैं। सिस्टम को गरियानेवालों में मीडिया की मुख्य धारा में शहरी सबसे ज्यादा होते हैं। ग्रामीण इलाकों के लोग तो दूर से टकटकी लगाए बस परिवर्तन को मुंह बाए देखते रहते हैं। ये सोचनेवाली बात है कि एक दिहाड़ी मजदूर या गरीब ग्रामीण व्यवस्था में सुधार को किस महत्वपूर्ण नजरिये से देखता है, जबकि शहरी लोग सारी सुविधाएं मिलने के कारण, सिस्टम जाए भांड़ में वाली मानसिकता से ऊपर उठ ही नहीं पाते। चाहे नक्सल समस्या या नाली की, उन्हें बस ड्राइंग रूम तक जिंदगी को समेट कर रखने की आदत सी हो जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे मुंबइया फिल्मों में निर्माता गरीबी और अन्य समस्याओं को लेकर फिल्में तो बनाते हैं, लेकिन वे ये नहीं जानते कि गरीबी क्या है? भूखे पेट रहने का दर्द क्या है? बेरोजगारी या तंगहाली किसे कहते हैं? गरीब ग्रामीण जानते हैं कि निजीकरण के रास्ते से उनकी समस्याएं हल होनेवाली नहीं। वे महंगे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठ सकते, वे बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में नहीं पढ़ा सकते। उनके लिए अंतिम और आखिरी विकल्प सरकार ही नजर आती है। वही उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी की सुविधा दे सकती है। और ये बेहतर नेताओं के चुनाव से ही संभव है। इसलिए ग्रामीण जमकर भागीदारी कर रहे हैं। ये भारत के मानसिक स्तर पर हो रहे विभाजन को भी इंगित करता है। ये बताता है कि यहां इंडिया और भारत देश को लेकर दो धाराएं काम कर रही हैं। इंडिया के रूप में वह देश है, जो अंगरेजी मीडिया, जानकारों और खाते-पीते लोगों को देश है, जबकि भारत उन तमाम मेहनतकशों और जद्दोजहद से रू-ब-रू होते लोगों का देश है, जो बेहतर सरकार के होने या न होने का फर्क जानते हैं। ऐसे में टीवी पर चाय की प्याली के साथ मीडिया द्वारा बार-बार अपील किया जाना भी एक हास्यास्पद कदम लगता है, क्योंकि चुनाव से पहले या रोजमर्रा के कामों में शहरी मतदाताओं के लिए उनके पास सिवाय अपराध की चटकीली दुनिया और बेशर्म राजनीतिक कारनामों के अलावा जागरूक करने के लिए कुछ नहीं होता। टाइम पास और गैर-जिम्मेदाराना कार्यक्रम के सहारे टीआरपी को ऊंचा करने की कोशिश होती है। इससे शहरी मतदाताओं, खासकर युवाओं के जेहन में समाज, सरकार के प्रति एक कोई मतलब नहींवाली मानसिकता घर कर गयी है। यही कारण है कि शहरी लोग, मात्र शहर के अपने उस दरबे के कबूतर हो गए हैं, जो सिर्फ गुटरगूं करना जानता है। हाशिये पर जा रहे सिस्टम को बदलने के लिए अभी भी ग्रामीण ही पहल कर रहे हैं। ग्रामीण जनता के लिए हमें शुक्रगुजार होना चाहिए।

Monday, December 7, 2009

धरती को बचाने की पहल करने की प्रार्थना

पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग जैसी घटना को लेकर सशंकित है। हमारी धरती पर परिवर्तन के बादल यानी भारी बदलाव के संकेत दिखने लगे हैं। वैसे में डिस्कवरी पर धरती पर हुए बदलावों पर रिपोतार्ज हमें उस मायावी दुनिया की सैर कराते हैं, जो सही में यहां थे। बदलाव के उस पार देखने की कोशिश होती है। एक प्रयास होता है। पता चलता है कि आस्ट्रेलिया और भारतीय उपमहाद्वीप आपस में जुड़े थे। ये देखकर प्रमाण सहित आश्चर्य होत है कि २०० किमी की दूरी पर बसे पर्वत कभी एक-दूसरे से जुड़े थे। फियरलेस प्लानेटवाले कार्यक्रम में समुद्र के नीचे से निकलनेवाले गर्म पानी के सोतों और कभी वहां समुद्र की जगह मैदानी इलाका होने की कहानी रोमांचित करती है। बदलाव... एक ऐसा बदलाव, जिसने जीवन रचा। आज का जीवन। जिस पर हम गर्व करते हुए महाशक्तिशाली होने का स्वांग रचते हैं। हम इस दंभ में रोज धरती को नुकसान पहुंचाते हैं। प्रयोगों के नाम पर, रहने के नाम पर और विकास के नाम पर। आज भी पूरी धरती देशों के नाम पर बंटी है। उसमें भी विकसित देश, विकासशील देश और पिछड़े देश। ये सोचिये कि कभी ये देश के खंड आपस में जुड़े थे। बदलाव के बयार में ये एक-दूसरे से दूर होते चले गए। सामूहिक रूप से तो सभी धरती पर ही रहते हैं, तब फिर इस धरती के लिए ऐसा उपेक्षित एहसास क्यों? हमारा स्वार्थ एक महाविनाश को आमंत्रित कर रहा है। हमने नदी का पानी रोक दिया। समुद्र को भी बांधने की कोशिश की। हमने धरती के अंदर सुराख कर उसके दिल को चोट पहुंचाने की कोशिश की। प्लास्टिक के नाम पर कभी न खत्म होनेवाला कचड़ा फेंक कर एक नासूर पहले से दे रहे हैं। ऐसे में धरती में होनेवाले बदलाव की कहानी को सबको जानने या बताने की जरूरत है। वैसे ही जैसे ये बताया जाता है कि सच बोलना अच्छी बात और झूठ बोलना बुरी।
अगर मृत्यु के बाद कोई जीवन है या आकाश से नीचे देखने की कोई व्यवस्था है, तो हम अपनी गलती के कारण आनेवाली पीढ़ियों को कष्ट भोगते पाएंगे या देखेंगे। जरूरी है कि इस बात को पूरी तरह आत्मसात कर लें कि इस धरती को बचाने के लिए हमें देश और राज्य के अहं से ऊपर उठना होगा। ऐसा नहीं हो कि जब तक हम पूरी तरह जगें, काफी देर हो चुकी होगी।

Sunday, December 6, 2009

अपने देश के उस काले अध्याय पर शर्म आती है..

१७ साल पहले आज के ही दिन यूं ही शाम के वक्त रेडियो पर समाचारों का दौर चालू था। सिर्फ एक लाइन थी कि बाबरी मसजिद गिरा दी गयी। यानी सद्भाव, सहिष्णुता के किले में कील ठोंक दी गयी। ज्यादा वक्त नहीं बीता था। हम भी राजनीति की एबीसीडी नहीं जानते थे। लेकिन भगवा झंडों के बीच आडवाणी का चेहरा जेहन में बैठ गया था। जुनून और जोश देखकर लग रहा था कि कुछ है। अरुण शौरी जी के लेखों और उमा भारती, विनय कटियार जैसे लोगों के भाषणों के अंश जैसे ये समझा रहे थे कि उस बाबरी मसजिद वाले स्थान को लेकर कोई विवाद है। उस वक्त हमारे जैसे लोग इतिहास की बारीकियों को क्या जानें, जो बताया जाता था, उसे सही या गलत मान लेते थे।

लेकिन बाबरी मसजिद के ध्वंस के बाद मुंबई की हिंसा और उन पर बनी फिल्मों, बदलते राजनीतिक किरदारों, भाजपा के अंदर खुद पैदा हुई फूट और देश के अंदर हालात काफी कुछ समझाते चले गए। ये भी समझाते चले गए कि हाथ मल-मलकर और हिला-हिलाकर रौद्र रूप धारण कर देश के अंदर ही दूसरे भाइयों को ललकारनेवाले हालात या जुनून हमें कहीं का नहीं छोड़ेंगे। अगर बाबरी मसजिद की जगह मंदिर का बनना था या उसकी जगह मसजिद का बनना था या और कुछ, तो ये अब तक हो जाना चाहिए था। नहीं हुआ। जो चाहते थे, वे कुछ कर नहीं सके। जो नहीं कर सके और नहीं कर सकते हैं, वे आज तक ताली पीट-पीटकर तमाशाई विलाप करते नजर आते हैं।

थका हुआ मन अब हमारे जैसे युवक से बार-बार पूछता है कि जिस हालात में आज ये देश है, उसमें इन तथाकथित विशुद्ध देशभक्तों का क्या योगदान रहा? क्या इन्होंने आतंकवाद का सफाया करने का कोई मूलमंत्र सुझाया? क्या इनके पास नक्सलवाद जैसी समस्या से निपटने का कोई कारगर उपाय है? क्या दूसरे लोगों को धर्मांधता का पाठ पढ़ानेवाले खुद को धर्म ग्रंथों या पोथियों के अध्ययन में डूबा पाए हैं। पेट के लिए रोटी चाहिए और उसके लिए पैसा, तो ये पैसा कहां से आए, क्या इसके लिए इन्होंने कोई रास्ता सुझाया? निष्कर्ष यही निकलता है कि कुछ हासिल नहीं हो पाया। यहां पार्टी का नाम नहीं लूंगा, लेकिन जिस पार्टी ने इन चीजों को लेकर आक्रामकता का सहारा लिया, वह आज कहां है? आज उसके नेताओं के पास कोई उत्तर क्यों नहीं है? क्यों आज तक आडवाणी रथयात्रा की प्रेत छाया से मुक्त नहीं हुए? क्यों लालू आज भी आडवाणी को गिरफ्तार कराने का दंभ पालते हुए वोट मांगते नजर आते हैं?

साथ ही देश और समाज को बांटनेवाले तथाकथित सेक्युलरों को लेकर भी सवाल उठते हैं, जो कि आजादी से लेकर आजतक समाज के विशेष वर्ग के हितैषी बनते रहे हैं, लेकिन आज तक वह वर्ग न्याय की गुहार लगाते नजर आता है। एक ही चश्मे से हर वर्ग को अलग-अलग रंग से देखने की कोशिश होती रही है। इससे जो खाई पैदा हुई, वह इतनी गहराती चली गयी कि उस पर कोई भी सफाई बेमानी नजर आती है। वे सेक्युलर, सेक्युलर शब्द के सही मायने को स्पष्ट नहीं कर पाए हैं। सेक्युलर किसे कहें, जो बहुसंख्यकों की हर बात का विरोध करे और दूसरे वर्ग विशेष का समर्थन या उसे जो हर वर्ग या धर्म को इतना स्पष्ट और संतुलित नजरिया दे, जिससे कोई विवाद पैदा न हो। लेकिन ऐसे प्रतिनिधि कहां और कैसे आएंगे, ऐसी पार्टी या दल कैसे विकसित होगी, ये भी बड़ा सवाल है। सवाल, उस जनता से भी है, जो बार-बार खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारती रहती है।

देश के इतिहास को मोड़ने का दंभ पालनेवाले आज खुद इतिहास होने की ओर उन्मुख हैं। बाबरी मसजिद की कहानी ये बताती है कि हम सब काल क्रम में मिट्टी के ढेर हैं। ऊपरवाले के लिए मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारा सब एक है। आप उसे निरंकार मानते हुए पूजें या आकार के साथ, कोई
बात नहीं, उसे हर प्रार्थना मान्य है। इन २० सालों में इस देश ने काफी काले अध्याय देखे हैं, लेकिन बाबरी मसजिद का अध्याय स्याह काले रंग से रंगा वह ब्लैक होल नजर आता है, जिसमें सारी दूसरी कारस्तानियां समाती नजर आती हैं।


अपने देश के उस काले अध्याय पर शर्म की काली छाया के साथ इस लेख का यही अंत।
Blog Widget by LinkWithin

जिनकी गली में रोज जाता हूं

MAIL ME

Your Name :
Your Email :
Subject :
Message :
Image (case-sensitive):